Sunday, June 22, 2008
कुछ हसरतें
गिला गर था कोई तो हमसे कहा होता
यूँ गैरों से शिकवा तो न किया होता
रंजिशें कुछ तो और बढ़ाई होती
अधूरे इश्क की तरह अधूरी दुश्मनी तो निभाई होती
ना था इश्क मुझसे न सही औरों से दोस्ती तो न बढ़ाई होती
तेरे ही ख्वाबों में रात गुजरती है तेरे ही अरमान से सेहर होती है
कम से कम अपनी चाहत तो मेरे दिल से मिटाई होती
मैंने कई अरमां सजा रखे थे अपनी पलकों पे
जाने से पहले इन्हें आग तो लगाई होती
रास्ते अलग करने से पहले
मुझे मेरी मंजिल तो बताई होती
तेरे ही अरमानों से सजा रखे थे मैंने अपने दरों-दीवार
जाने से पहले इस समशान में इनकी लाश तो दफनाई होती
शिकवे करने के लिए गैरों के पास जाने की जरूरत क्या थी
कभी अपनों के सामने तो बात उठाई होती
दर्द तेरे बख्शे हुए ज़ख्मों का नहीं
तकलीफ तो तेरी दी हुई खुशियाँ देती हैं
तेरे साथ गुज़ारा हर लम्हा याद है मुझे
जाने से पहले मेरे जेहन में बसी अपनी चाहत की इबारत तो मिटाई होती
मुझे बर्बाद ही करना था तो मुझसे सिर्फ एक बार कहा होता
यूँ जहाँ में तेरी रुसवाई तो न होती
मालूम है मुझे कुछ मजबूरियाँ रही होगीं तेरी
पर मुझसे अपनी हालत तो न छुपाई होती
मैं तेरा प्यार नहीं न सही;तलबगार तो हूँ
अपने आशिक की ये हालत तो न बनाई होती
Saturday, June 21, 2008
यह है मुंबई मेरी जान
हर तरफ़ बेशुमार भीड़, तनहा-तनहा आदमी
हर तरफ़ शोर ही शोर, फ़िर भी खामोश हर जुबान
हर तरफ़ इंसान ही इंसान, इंसानियत गुमनाम
हर किसी को मंजिल की तालाश, हर कोई रास्तो से अनजान
हर तरफ़ जगमगाती रौशनी, हर दिल में अँधेरा
हर तरफ़ खुशियों की दुकान, हर तरफ़ गमगीन इंसान
आसमान छूती इमारतें, जमीन में धंसता जाता इंसान
हर किसी की है पहचान, हर कोई एक दूसरे से अंजान
यह है मुंबई मेरी जान
Tuesday, June 17, 2008
ज़रा सोचिये
मानसून की जल्दी आवक की खुशी मे सभी इतना मगन हैं की उन्हें इस अति चिंतनीय बात पर विचार करने का समय ही नहीं है। अब तक हम अपने पर्यावरण के साथ जो खिलवाड़ करते आए है उसके जो प्रभाव अब तक दिखे यह उन सबसे कहीं बढ़कर है। क्योंकि अगर इसी तरह मौसम मे बदलाव होता रहा और धरती पर इसी तरह के प्रभाव पड़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब पूरा विश्व बुंदेलखंड मे तब्दील हो जाएगा
Monday, June 9, 2008
एक सुबह
फ़िर सब के जगने का वक़्त आ गया है,
हर सुबह के sath घर मे एक नया अख़बार आता है,देश दुनिया के बरे मे सबको जगाने सब को बताने की क्या कुछ हो रहा है हमारे इस जहाँ मे'
पर हम ने न जगने की कसम खा रखी है,
हम सिर्फ़ अख़बार पढ़ के एक किनारे रख देते हैं ,और फ़िर उसमे लिखिघटनाओ को भूल जाते हैं,फ़िर ने सुबह नया अख़बार नई खबरें,लेकिन हम उन ख़बरों पर कितना विचार करते हैं,क्या हम उन घटनाओं से अपने समाज का कोई रूप जानने की कोसिस करते हैं,क्या हम जानने का प्रयत्न करते हैं की घटनाओं के दूरगामी परिदम क्या होंगे ,
Tuesday, May 27, 2008
गुर्ज़र आन्दोलन
अगर गुर्ज़रों की ही तरह इस देश मे कुछ और समुदाय भी इसी तरह मांग करने लगें तो ......
उसके बाद कुछ और, फ़िर कुछ और...
क्या होगा आख़िर तब
आज गुर्ज़रों की मांग के रूप मे हमारे सामने आराक्चन का एक भयावह पछ सामने आया है
गुर्ज़रों की मांग और उनके आन्दोलन से उत्पन्न हिंसा हमें दिखाती है की मंडल के दौर के साथ हमारे सामने जो लोलीपॉपरखा गया था वो वास्तव मे एक मीठे जहर का बना हुआ था।जिससे हम चाह के भी छुटकारा नहीं पा सकेंगे और धीरे धीरे हमारा समाज पंगु होता जाएगा, इस आशा के कारण की arachan की लाठी का सहारा पाकर हम भी आगे जायेंगे
ज़रा सोचो क्या बैशाखी के सहारे कोई
Tuesday, May 20, 2008
लड़की
एक लड़की,खोल खिड़की
गै थी भाग,खेलने के लिए
पर
वह नन्हा ह्रदय
डर रहा था,
अपनी माँ के खौफ से।
फ़िर भी-
उसकी अंतरात्मा उसको उत्साहित कर रही थी
एक अंजना अवलंबन पाकर,
जुट गै वह खेकने मे।
चौंक पड़ी वह अपना नाम सुनकर अचानक
शायद
किसी ने पुकार दी थी?
हाँ,
यह उसकी माँ के क्रोध का प्रभंजन था
वास्तव मे,
उश्की माँ ने पुकार दी थी उसे
कांपता ह्रदय
खड़ा हो गया माँ के सामने,
माँ की क्रोध्पूरित नेत्रों की शिकार
देख रही थी पिता को वह
अचानक.....
पिता रूद्र मे बदला
एक... दो...
कई चीखें रोक रही थीं छड़ी को
मगर.....
फ़िर भी ख़त्म नाही हुआ यह कहर
अंत मे...
माँ के इशारों पर
काम करती रही वह
जुट गै थी माँ की तयारियों मे
क्योंकि
उदघाटन करना था इन्हें
किसी बालिका विद्यालय का
एक कप चाय पहुँचनी थी पिता को
क्योंकि
बल मनोविज्ञान पर लेक्चर देने के लिए वह
स्क्रिप्ट तैयार कर रहे थे ।
अंत में...
माँ जा चुकी थी,
पिता लिख रहे थे ,
और वह बढ़ रही थी.......
जूठे बर्तनों की तरफ़।
द्वारा:
Wednesday, May 14, 2008
एक सीख
कदम यकीन मे मंजिल गुमांन मे रखना
जो साथ है वाही घर का नसीब है पर
जो खो गया है उसे भी मकान मे रखना
चमकते चाँद सितारों का क्या भरोसा है
ज़मीन की धूल भी अपनी उडान मे रखना
सवाल बिना मेहनत के हल नाही होते
नसीब को भी मगर इम्तहान मे रखना।
philosophy of life
he who is over cautious about himself
falls into
dangers at every step,
he who afraid of losing
honour & respect
gets only disgrace,
he who is always
afraid of loss always loses.
by:swami vivekanand
सैनिक व नेता
यह नेता है,
वह देश को सब कुछ देता है,
यह देश का सब ले लेता है,
वह पेट खलाये लड़ता है,
यह पेट फुलाए बैठा है,
वह भी रक्त बहाता है,
यह भी रक्त बहाता है,
फर्क?
फर्क सिर्फ़ इतना है
वह रिपु का रक्त बहाता है,
यह अपनों को ही लड़वाता है।
वह त्याग बलिदान का दीवाना,
यह वोट दान का परवाना.
वह स्वतंत्रता का पुजारी है,
पर यह सत्ताधारी है।
फ़िर
अंत समय जब आता है,
वह भी मर जाता है,
यह भी मर जाता है,
फर्क?
फर्क सिर्फ़ इतना है,
वह शत्रु की गोली खाता है,
पर यह चारा ही खा जाता है,
वह मर कर इतिहास बनाता है,
यह कांड व घोटाले छोड़ जाता है।
वह अमर शहीद कहलाता है,
यह सी बी आई जांच मे फंस जाता है।
वह मातृभूमि की मिटटी मे मिल जाता है,
यह पक्की कब्र बनवाता है।
द्वारा:कौशलेन्द्र
Wednesday, April 2, 2008
बम क्या है?
कुछ डरो, न इसमे केवल इसमे बुद्धि भरम है,
सोचो यह क्या है जो कहलाता बम है।
यह नही स्वदेशी आन्दोलन का फल है,
नही बायकाट अथवा स्वराज्य को कल है।
जब-जब नृप अत्याचार करा करते,
और प्रजा दुखी चिल्लाते ही रहते हैं,
नही दीनों की जब कहीं सुनाई होती,
तब इतिहासों की बात सत्य ही होती।
माधव कहता यह किसका बुरा करम है,
सोचो यह क्या है जो कहलाता बम है।