Sunday, August 30, 2009

बूँदें बारिश की

बारिश की बूँद!
हवाओं के रथ पर सवार,
सागर का दामन छोड़कर,
गई थी बादल के पास,
शायद!
ये सोच कर की वही आशियाना होगा,
उसका।
और सागर शांत सा,
बस देखता रहा...
और वो चली गई थी,
अपने बादल के पास।
काफ़ी दिनों तक अठखेलिया करते हुए,
विचरती रही खुले आसमान में,
कभी तारो की महफ़िल में,
कभी चांदनी में,
मदहोश सी!
बादल की बाहों में,
उसी क आगोश में खोती चली गई...
और सागर बेचारा खामोशी से,
देख रहा था....
कभी ख़ुद को कोसता....
कभी अपनी नियति मान कर,
शांत हो जाता॥
उमड़ता रहा गरजता रहा॥
शायद तड़पन थी उसकी...
जो लहरों का रूप लेकर किनारे से टकरा रही थी॥
और फ़िर.....
बहारो ने रुख बदला,
घटाए छाई,
उस नासमझ को पता ही न चला,
और वो गिर रही थी,
अपने पल भर के आशियाने से.....
रोती हुई,बिलखती हुई.....
शायद पछता रही थी अपनी नादानी पर,
और बादल!
मुस्कराता हुआ,लहराता हुआ...
गुजर रहा था,
कोई दूसरी बूँद की तलाश में।
और वो बूँद,
शकुचाती हुई,शर्माती हुई,
धीरे धीरे बढ़ रही थी....
बढ़ रही थी,
सागर के पास,
और सागर,
अपनी बाहें पसारे,सब कुछ भुलाकर,
इंतज़ार कर रहा था,
अपनी प्यारी सी बूँद का!!!

Saturday, August 29, 2009

जीने का सहारा हो जाएगा

वक्त वह भी था- गुज़र गया
वक्त ये भी है गुज़र - जाएगा
ख्वाबों के महलों में रहने वाले
तू ख्वाबों सा ही बिखर जाएगा
क्यों तुझे सताती है याद उस शहर
वहां अब कौन है तेरा - तू किसके घर जाएगा
अनजान राहों में मंजिल तलाशने वाले
सम्हल कर रहना वरना फ़िर से धोखा खाएगा
भागता फिरता है तू जिन सायों के पीछे
एक दिन उन्हीं के अंधेरों में गुम हो जाएगा
मंजिलों के फेर में मत पड़
तू मुसाफिर है मुसाफिर सा ही रह
वरना अपने आप से भी जुदा हो जाएगा
शबे फुरकत भी गुज़र जायेगी
शबे कुरबत सी ही
जो गया था तुझे छोड़कर अकेला
वो अकेला ही तेरे पास आयेगा
ढलते हुए सूरज से यारी रख ऐ दोस्त
गर उगते हुए सूरज के पीछे भागा
तो तू भी इसी भीड़ का हिस्सा हो जायेगा
नहीं मिलती राहत गर महफिलों में
तो दिल लगा तनहाइयों से
वरना तू भी मेरी तरह
यार की गलियों का बंजारा हो जायेगा
बस्तियां गर हैं वीराँ
तो आशियाँ बना जंगलों में
वरना तू बेघर बेसहारा हो जाएगा
तू नशे में है गर तो नशे में ही रह है
गर नशा उतरा तो तू भी
मेरी ही तरह बावरा हो जाएगा
साहिलों पर बैठकर ढूंढता है किनारे
एक बार दरिया में तो उतर कर देख
मझधार ही ख़ुद तेरा किनारा हो जाएगा
इश्क करना है तो कर अपने आप से
वरना तू भी दुनिया की नज़रों में बेचारा हो जाएगा
खुशियाँ कभी साथ नहीं निभाती ऐ दोस्त
हो सके तो कर ले ग़मों से यारी रख
कम से कम जीने का सहारा हो जाएगा

Friday, August 14, 2009

आज़ादी के 63 साल

साथियों,
कल हम आज़ादी की 63वीं सालगिरह मन रहे हैं. यह आज़ादी जो क़रीब डेढ़ सौ सालों से भी ज़्यादा चले उस मुक्ति संग्राम का नतीजा है जिसको पाने के लिए हमें असंख्य देशभक्त वीरों ने अपने प्राणों की आहुति देने में ज़र्रा बराबर भी गुरेज़ नहीं किया. मगर क्या आज का देश वही देश है जिसकी उन्होंने तमन्ना की थी? पिछले छह दशकों के विकास के सारे दावों के बीच एक तरफ़ सत्तर फ़ीसदी से भी ज़्यादा आबादी ज़िन्दगी की बुनयादी सहूलातों से मुस्तस्ना हैं तो दूसरी तरफ़ चाँद ऐसे लोग हैं जो देश की सारी संपत्तियों को हथियाए ही बैठे हैं. सारे रिसोर्सेज़ पर
उनका क़ब्ज़ा बरक़रार है. जावेद अख़्तर ने खूब कहा है:
ऊँचे मकानों से घर मेरा घिर गया,
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए.


आज़ादी के ६३ साल के बाद जो हिन्दोस्तान हम देख रहे हैं उसको शायद हमारे उस दौर के शुअरा ने काफी पहले महसूस कर लिया था. इस झूठ-मूठ की आज़ादी को उन्होंने बहुत पहले ही भांप लिया था, तभी तो फैज़ अहमद 'फैज़' ने कहा:
ये दाग़-दाग़ उजाला ये शब-ग्दीज़ा सहर,
वो इन्तेज़ार था जिसका वो यह सहर तो नहीं.


आज़ादी का यह ड्रामा जिसने मुल्क को बांटा, हिन्दू मुस्लमान को बांटा. हिंदू और मुसलमान दोनों एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो उठे. पंजाब में हिंदुओं और सिखों का क़त्लेआम हुआ तो और बंगाल में मुसलमानों का. इंसानियत मौत के दरवाज़े पर खड़ी मुस्कुराती रही और हैवानों का राज्य हो गया. तब अली सरदार जाफ़री ने मुल्क के नेताओं से यह सवाल पूछा:
कौन आज़ाद हुआ, किसके माथे से स्याही छूटी
मेरे सीने में दर्द है महकूमी का
मादर-ए-हिंद के चेहरे पे उदासी है वही.

खंज़र आज़ाद है सीनों में उतरने के लिए
मौत आज़ाद है लाशों पे गुजरने के लिए
कौन आज़ाद हुआ, किसके माथे से स्याही छूटी..

तो दूसरी तरफ मजाज़ ने कहा:
यह इन्क़लाब का मुसदा है इन्क़लाब नहीं,
यह आफ़ताब का परतव है आफ़ताब नहीं.


डा.'राही' मासूम रज़ा ने नेताओं और फिरक़ापरस्त लोगों की तरफ उंगली उठाते हुए कहा कि,
एक मिनिस्टर है तस्वीर के वास्ते
और एक मिनिस्टर है ताजिर के वास्ते
और जनता है सिर्फ ज़ंजीर के वास्ते.


हिंदुस्तान का बंटवारा करवाने वालों की तरफ़ इशारा करते हुए सरदार जाफ़री ने मज़ीद कहा:
तुमने फ़िरदौस के बदले में जहन्नुम लेकर
कह दिया हमसे कि गुलिस्तां में बहार आयी है,
चंद सिक्कों के एवज चंद मिलों की ख़ातिर तुमने
शहीदाने वतन का लहू बेच दिया
बाग़बांं बन के उठे और चमन बेच दिया..

हिंदुस्तान के बंटवारे की सख़्त मुख़ालफत करते हुए मौलाना आज़ाद ने 1929 में कहा,
"अगर आज़ादी फरिश्ता कुतुब मीनार पर खड़े होकर ये ऐलान करे कि हिंदुस्तान को 24 घंटे में आज़ादी मिल सकती है बशर्ते कि वो हिंदू और मुसलमान की दोस्ती को अलग कर दे तो मैं कहूंगा कि भारत को ऐसी आज़ादी नहीं चाहिए."

इस बँटवारे को देखकर डा.'राही' मासूम रज़ा ने ये लिखा:
चंद लुटेरे बड़े आदमी बन गये,
और हम अपने ही घर में शरणार्थी बन गये.


मगर बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि 63 साल के बाद भी हम भगत-ओ-गाँधी के ख़्वाबों का हिंदुस्तान न बना सके. हिंदुस्तान आज सरमाये के दल्लालों की क़यादत में पूरे ज़ोर के साथ पूंजीवादी सुधारों के रास्ते पर गामज़न है. इन पूंजीवादी सुधारों से मजदूरों, किसानों और मेहनतकशों के दुख-दर्द बढ़ते जायेंगे, चाहे ये सुधार 'मानवीय चेहरे' के साथ लागू किये जायें या उसके बग़ैर. उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के एजेंडे को हराने के लिये लड़ने के साथ-साथ, हमें पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त करने और उसके स्थान पर समाजवाद की स्थापना करने की तैयारी करनी चाहिये. समाजवाद का मतलब है वह व्यवस्था जिसमें उत्पादन के साधनों पर समाज की मालिकी और नियंत्रण होगा, जिसमें सभी की सुरक्षा और खुशहाली सुनिश्चित होगी. अब सरमायदारों की हुकूमत को चुनौती देने का वक्त आ गया है.

'साहिर'लुधयानवी के शब्दों में:
जंग सरमाये के तसल्लुत से,
अम्न जम्हूर की ख़ुशी के लिए..

तो हमारी जंग इस सरमाये के तसल्लुत के ख़िलाफ़, पूंजीवाद के ख़िलाफ़, नाबराबरी के ख़िलाफ़ और सारे शोषण के विरूद्व जारी रहे गी.

इंक़लाब जिंदाबाद!!

इन्क़लाबी सलाम के साथ,
आतिफ रब्बानी

Wednesday, August 12, 2009

यौम-ए-आज़ादी (Independence Day)

यौम-ए-आज़ादी मनाने का अब अरमान नहीं,
क्योंके यह भगत-वो-गांधी का हिन्दोस्तान नही.

बापू ने मुल्क बनाया था ग़रीबों के लिए,
मगर ग़रीब का जीना यहाँ आसान नहीं.

शहर जलते रहे ये बांसुरी बजाते रहे,
इन शहंशाहों में शायद कोइ इंसान नहीं.

तुझे बचाने को मरना पड़ा तो हाज़िर हैं,
यह सच्चा इश्क़ है शाह का फरमान नहीं.

वतन की इज़्ज़त की मिल जुल के दुआएँ मांगें,
हमारा फ़र्ज़ है उस पर कोइ एहसान नहीं..

Monday, August 10, 2009

स्वास्थ्य असंतुलन

देश में भारी आर्थिक असमानता, भयावह ग़रीबी व शोषण कोई नई बात नहीं है, और नई बात ये भी नहीं कि देश में स्वास्थय सेवाओं की स्थिति बहुत ही निराशाजनक और पतनशील है. जहाँ एक तरफ सार्वजनिक स्वास्थय सेवाएं वित्त की कमी, दवाईओं की कमी, आवश्यक वस्तुओं की कमी, कुशल कर्मियों की कमी से जूझ रही हैं. वहीं दूसरी तरफ स्वास्थय सेवाओं में निजी भागीदारी दिन पर दिन बढ़ रही है और इस निजी भागेदारी का मतलब है ग़रीबों के लिए इन सेवाओं का अपवर्जित(exclusion), महंगा और अप्राप्य होना. और शायद यही वजह है भारत के स्वास्थय सूचक (health indicators) बहुत ही ख़राब दशा को निरुपित करते हैं. और परिणाम स्वरुप भारत को मानव विकास सूचकांक(Human Development Index) में काफी नीचे स्थान मिलता है.

यह सर्वमान्य है कि स्वास्थय सेवाओं में घोर क्षेत्रीय असमानता है. इन असमानताओं को हम दोनों स्तरों के संकेतकों- प्रक्रिया और परिणाम संकेतकों के ज़रिये देख सकते हैं. देश की औसत स्वास्थ्य स्थिति बहुत ख़राब है. स्वास्थय पर प्रति व्यक्ति ख़र्च भी अंतरराष्ट्रीय मानकों से बहुत कम है. हमारा सार्वजनिक स्वास्थ्य ख़र्च(public health spending) दोनों रूपों में-सकल घरेलू उत्पाद का हिस्सा(share of GDP) और प्रति व्यक्ति खर्च(per capita), दुनिया में सबसे कम ख़र्च करने वालों देशों में से है. लेकिन अगर हम राज्यों को देखें तो यहाँ तीव्र असंतुलन नज़र आता है. इस पूरे स्पेक्ट्रम में एक तरफ वे राज्य हैं (जैसे- केरल, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु) जहाँ देश कि 18.8 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, और इनके स्वास्थ्य संकेतक(health indicators) अधिक विकसित मध्यम आय(more developed-middle income) देशों-वेनेजुएला, अर्जेटीना और सऊदी अरब के जैसे अथवा सामान हैं. और स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर बीमारू राज्यों (उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, असम, राजस्थान, बिहार और झारखंड) का समूह है जहाँ देश की लगभग 42 प्रतिशत जनसँख्या निवास करती है और इन राज्यों के स्वास्थय संकेतक उप-सहारा देशों और अन्य कम आय वाले देशों-सूडान, नाइजीरिया और म्यांमार आदि के अत्यंत क़रीब या यूँ कहें कि बराबर हैं.

राज्यों के बीच इस असंतुलन की वजह न सिर्फ़ परिणामों से संबंधित है बल्कि स्वास्थ्य व्यय का वित्तपोषण करने से भी सम्बंधित है. और चूँकि ग़रीब राज्यों में स्वास्थय पर, कम सरकारी ख़र्च का प्रावधान रहा है और यह कम स्वास्थय-व्यय भी असंतुलन का एक कारण है. मिसाल के तौर पर 2001-02 में, उत्तर प्रदेश में , जन स्वास्थ्य ख़र्च कुल स्वास्थ्य व्यय के प्रतिशत के रूप में 7.5 प्रतिशत (या 84 रुपये प्रति व्यक्ति) जबकि, मिज़ोरम में 89.2 प्रतिशत (या 836 रुपये प्रति व्यक्ति ). अफ़सोस की बात यह है कि देश के प्रमुख राज्यों में से कोई भी राज्य लोक स्वास्थ्य खर्च के बुनियादी स्तर यानि प्रति व्यक्ति ख़र्च 500 रुपये को हासिल न कर सका है.

क्षेत्रीय असमानताओं को चिकित्सा कर्मियों की उपलब्धता के परिप्रेक्ष्य में भी देख सकते हैं. पूरे देश में एलोपैथिक स्नातक डॉक्टरों की उपलब्धता केवल 0.6 प्रति हजार है. और ये उपलब्धता काफ़ी असम(uneven) है. दक्षिण के राज्यों में और अन्य अपेक्षाकृत अधिक विकसित राज्यों में डॉक्टरों का सांद्रण(concentration) अधिक है. मिसाल के तौर पर, पंजाब में डॉक्टरों की उपलब्धता उत्तर प्रदेश के मुक़ाबले पाँच गुना है. यही नहीं, इन डॉक्टरों का अभिसरण(convergence) शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में अधिक है बनिस्बत ग्रामीण क्षेत्रों के. इस प्रकार ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्र या तो कुछ हद तक डॉक्टरों से वंचित हैं या इन क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता कम है.

इलक़ायी गैर बराबरी को एक दूसरे ज़ाविए से भी देखा जा सकता है और यह है मेडिकल संस्थाओं और मेडिकल कालेजों की उपलब्धता. मेडिकल कालेजों की उपलब्धता भी चिकित्सा कर्मियों की तरह काफी असमान रूप से वितरित है. दक्षिणी के चार राज्यों में, पूरे देश के मेडिकल कॉलेजों के 63 प्रतिशत कॉलेज और पूरे देश की उपलब्ध कुल सीटों की 67 प्रतिशत सीटें मौजूद हैं. चिकित्सा कर्मियों की सबसे ज़्यादा कमी बीमारू राज्यों (बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़), उड़ीसा और हरियाणा के साथ साथ पूर्वोत्तर के राज्यों में हैं. स्वस्थ्य कर्मियों का नियंत्रण और निगरानी में कमी भी बहुत कुछ अनापेक्षित नतीजे देती है. डॉक्टरों, नर्सों, दंत चिकित्सकों और अन्य लोगों के लिए सांविधिक परिषदों क़रीब-क़रीब बेकार हैं.

चिकित्सकों, डॉक्टरों, चिकित्सा कर्मियों की अनुपलब्धता एवं कमी, चिकित्सा सम्बन्धी फंड्स की कमी, स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे की कमी और विधि व विनियमन की कमी, लोगों को निजी स्वास्थ्य सेवाओं को लेने को मजबूर करती है. और इसका ख़ामियाज़ा ग़रीब राज्य के ग़रीब लोगों को भुगतना पड़ता है. क्यूंकि ग़रीब राज्यों में सार्वजनिक स्वास्थय सेवाओं का सरकारी प्रावधान या तो अनुपलब्ध है या अत्यंत अपर्याप्त है. इस प्रकार, सबसे गरीब राज्यों में, अस्पतालीकृत बीमारियों की वजह से ग़रीब परिवारों को वित्तीय संकट में फंसने की बहुत ही ज़्यादा संभाव्यता रहती है. एनएसएसओ सर्वेक्षण के अनुसार बिहार और उत्तर प्रदेश के अस्पताल में भर्ती क़रीब एक तिहाई से अधिक लोग चिकित्सा व्यय के कारण ग़रीबी की ज़द में आ गए.

भारत में, स्वास्थ के लिए जेबी खर्च(out-of-pocket expenditure) या निजी खर्च न सिर्फ ज़्यादा हैं बल्कि हाल के दिनों में तेजी से बढ़ा भी हैं. एनएसएसओ के सर्वेक्षण के अनुसार, 1995-96 और 2003-04 के बीच ग्रामीण अस्पताल में भर्ती लागत में 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि शहरों में अस्पतालीकरण की लागत में 126 प्रतिशत तक का इज़ाफ़ा हुआ. ध्यान देने योग्य बात यह है कि स्वास्थय पर निजी ख़र्च अक्सर उन परिवारों को वहन करना होता है जो ये ख़र्च बर्दाश्त न करने की स्थिति में होते हैं. अतः जनसँख्या का वो पांचवा हिस्सा जो ग़रीबी रेखा के बिलकुल ऊपर है, को अगर कभी किसी गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़े तो वे स्वतः ग़रीबी रेखा के नीचे चले जायेंगे.

'चिकित्सात्मक दवाओं पर ख़र्च'(expenditure on therapeutic drugs) स्वास्थय ख़र्च की वह मद है जिसमें लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है. गोकि, स्वास्थय ख़र्च कुल जेबी ख़र्च का लगभग 75 प्रतिशत है, लेकिन इस ख़र्चे से उन लोगों कि हालत ज़्यादा ख़राब होती है जो लोग ग़रीब राज्यों निवास करते हैं. वजह बिलकुल साफ़ है- ग़रीब राज्य मतलब स्वास्थय पर कम सरकारी ख़र्च मतलब राज्य के निवासियों का ज़्यादा निजी ख़र्च. राजस्थान, बिहार, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में चिकित्सा व्यय में औषधियों का हिस्सा दोनों, आतंरिक रोगी(in-patient) व वाह्य-रोगी(out-patient) के रूप में काफी अधिक, लगभग 90 प्रतिशत रहा है. औषधियों पर यह बढ़ती व्यय न केवल नई पेटेंट व्यवस्था का प्रभाव दर्शाती है बल्कि भारतीय औषधि निर्माण क्षेत्र की अपर्याप्त विनियमन को भी दिखाती है.

असमानताओं के विभिन्न स्रोतों और कारणों पर दृष्टिपात करते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि सार्वजनिक स्वास्थय सेवा के क्षेत्र में सरकार को आगे आना ही नहीं बल्कि पूरे स्वास्थय सेवा को अपने हाथ में लेना होगा. और इन सब कामों के लिए संसाधनों की कमी का रोना रोना और यह कहना कि एक ग़रीब देश में संसाधनों की कमी ही मौलिक बाधा है, एक बेबुनियाद बात है. हम ज़्यादा दूर नहीं बल्कि अपने पड़ोसी अपेक्षाकृत कम आमदनी वाले देश- बंगलादेश और श्रीलंका से सबक़ ले सकते हैं जो अपनी अपेक्षाकृत कम आमदनी के बावजूद स्वास्थय के संदर्भ में हमसे ज़्यादा विकसित हैं.

Friday, August 7, 2009

मैं इंतज़ार आज भी किया करता हूँ

मै इंतज़ार आज भी किया करता हूँ
उस पहली बारिश का
साथ चाय पीने की उस गुज़ारिश का
कैंटीन की उस चाय का
उन जूठे समोसों का
उस खामोश हंसीं का
उस मिलने की बेकरारी
और न मिल पाने की बेबसी का
मैं इंतज़ार आज भी किया करता हूँ
जादे की उस धूप का
गर्मी की उन शामों का
वक्त-बेवक्त मोबाइल पर आने वाले
उन मैसेजों का
उन बेचैन रातों का
उन हडबडाहट से बाहरी सुबहों का
मैं इंतज़ार आज भी किया करता हूँ
साथ देखी उस पहली पिक्चर का
तेरी उस पहली छुअन का
तेरी उन छोटी-छोटी शरारतों का
तेरे पहली नज़र का
तेरे पहलूँ में गुज़रीं हुई शामों के उस मंज़र का
तेरे साथ बीते उस सफ़र का
मैं इंतज़ार आज भी किया करता हूँ
ये जानते हुए भी कि ये इंतज़ार
सिर्फ एक इंतज़ार रह जायेगा
बीता हुआ वक़्त फिर कभी लौट कर नहीं आयेगा
ये इंतज़ार मुझे ताउम्र तड्पाएगा
मैं तेरा इंतज़ार आज भी किया करता हूँ

मिलना कोई जरूरी तो नही

मिलना कोई जरूरी तो नहीं

बात करना भी कोई जरूरी तो नहीं

मिल के भी नहीं मिल पाये वो हमसे

फ़िर भी दिलों में कोई दूरी तो नहीं

उनकी हर एक बात है याद हमें इबादत की तरह

उनसे दूर जाने के लिए

उनकी यादों को मिटाना जरूरी तो नहीं

हर तरफ़ बिखरा है जो खुशबू की तरह

उसका ख़ुद आना जरूरी तो नहीं

हर वक्त करूँ प्यार का इज़हार

ऐसी भी क्या मजबूरी है

जो बात झलकती हैं आंखों से

उसे शब्दों में बताना जरूरी तो नहीं

वो भले ही भूल जायें हमको

पर हम उन्हें याद भी न आयें

ये जरूरी तो नहीं

जानता हूँ कि न मिल पाएंगे वो अब मुझको

पर मैं उन्हें पाने कि ख्वाहिश भी न

मेरी कोई मजबूरी तो नहीं

न कर पाए वो वफ़ा हमसे

जरूर कोई मजबूरी रही

होगीपर मैं उनसे बेवफाई करूँ

मेरे प्यार में ऐसी कोई कमजोरी तो नहीं

न मिल पाया मेरे प्यार को किसी रिश्ते का नाम न सही

मेरे इश्क के मुक्कमल होने के लिए

ज़माने की मंजूरी ज़रूरी तो नहीं

Saturday, May 30, 2009

माफ करना

देखकर हुस्न तेरा
ग़र हो जाऊं शायर-दीवाना
तो
माफ करना।
बंधके खिंचा चला आऊं तेरे सदके पे बार-बार
तो
माफ करना।
हो जाए ग़र इश्क तुझे हौले-हौले मुझसे
तो
माफ करना।
उड़ जाए नींद रातों की तेरी ग़र मुझसे
तो
माफ करना।
बेचैन है ये दिल-ए-नादां ग़र थाम लो लगाम
तो अच्छा,
ख़ता हो जाए वरना
तो
माफ करना।
छुपाकर दर्द अपना कांटों में खुशबू बिखेरना आता है।
गैर तो गैर अपने भी गर ना समझें तो मरहम लगाना आता है।।
हम पर तोहमत लगाने से पहले झांक लो जरा अपने जिगर में भी।
ग़र शूल शेष हों दामन में, सजा दो चेहरे पे मेरे वो भी।।
कभी-कभी यूं भी हमने, ग़म ही ग़म उठाए हैं।
पीकर एक-एक घूंट आंसू का, औरों को खुशी दिलाए हैं।।

Tuesday, May 5, 2009

भूख का अर्थशास्त्र

यूँ तो भूख सबको लगती है, बीमारियाँ सबको घेरती हैं. भय सबको सताता है और मौत सबको आती है. मगर इस भूख का एहसास उसे अधिक होता है जिसे भूखे पेट सोना पड़ता है. ख़ाली पेट चिर निद्रा में जाने का संताप सिर्फ वही लोग समझ सकते हैं 'जिनके हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं'... हम और आप जैसे अघाए हुए लोग नहीं. वे तो क़तई नहीं जिनके लिए भूख एक सच नहीं सिर्फ एक अर्थशास्त्र का विषय भर है.

भूख का जो अर्थशास्त्र होता है उस पर विचार करने के लिए बहुत सारे विशेषज्ञ हैं जो जहाजों में बैठ कर पूरी दुनिया में सेमिनारों आदि में अपने उच्च विचार व्यक्त करते रहते हैं कि ग़रीबी और भूख से कैसे निपटा जाए. वे भरपेट नाश्ता कर के आते हैं, लंच में उनके लिए थालियां सजी होती है और डिनर में भोजन का शाही इंतजाम होता है.

ये लोग भूख को आंकडों में बदल देते हैं. मौत भी इनके लिए गिनती होती है. बहुत सारे न समझ में आने वाले अर्थशास्त्र के समीकरणों के ज़रिये ये हमें समझाते हैं कि इस आंकडें में वह आंकडा मिला दो तो भूख और गरीबी के सारे पापों का अंत हो जाएगा. दिक्क़त सिर्फ यह है कि आंकडों से पेट भरता नहीं हैं.

जिसे ग़रीबी रेखा कहा जाता है वह दरअसल मौत की या मौत से भी बदतर ज़िन्दगी का एक संधि बिंदु है जहां करोड़ों लोग जन्मते हैं और इसी बिंदु पर उनकी ज़िन्दगी स्थगित हो जाती है. होने को अपने देश में बच्चों के लिए मिड डे मील और अभागों के लिए लंगर की शैली में रोटी या भात की व्यवस्था की जाती है लेकिन यह पेट तो भरती है मगर कुपोषण और अल्प पोषण के शिकारों की संख्या बढाती हैं. जो बच्चे स्कूल जाते ही इसलिए हैं कि उन्हें एक वक्त का भोजन मिल जाएं वे पढाई का मतलब पेट भरने से समझते है और जिस तरह का भोजन उन्हें नसीब होता है उससे उन बेचारों की जवानी तो आती नहीं, देखते देखते वे बूढ़े हो जाते हैं और भूख की यह विरासत अपनी अगली पीढ़ियों को सौंप कर चले जाते हैं.

जितना पैसा सरकारी और दुनिया की तथाकथित कल्याणकारी संस्थाओं द्वारा भूख और ग़रीबी के अध्ययन पर खर्च किया जाता है वह अगर सीधा ग़रीब की दहलीज़ तक पहुंचा दिया जाए तो आधी समस्या वैसे ही हल हो जाएगी.

हमारा देश अब डेढ़ अरब नागरिकों का देश बनने जा रहा है और इनमें से कम से कम चालीस करोड़ लोग ऐसे है जिन्हें ग़रीबी की सरकारी सीमा रेखा के नीचे माना जाता है. यह परिभाषा भी अपने आप में एक माज़ाक़ है. जिसे दिन भर में 2200 कैलोरी के बराबर भोजन मिल जाए और जिसकी औसतन पांच सदस्यों के परिवार की आमदनी महीने में चार सौ चौदह रुपए से ज्यादा हो उसे अपनी सरकार ग़रीब नहीं मानती. 2200 कैलोरी का मतलब है पांच रोटियां और एक कटोरी दाल या काम चलाऊ तरकारी. जो लोग इस आधार पर ग़रीब और अमीर के बीच का विभाजन करते हैं वे असल में हमारे समाज और देश दोनों के अपराधी हैं और उनके लिए जो भी सज़ा तय की जाए वह कम ही होगी.

हमारे देश में अनाज की कमी नहीं है. भारत में ग़रीब और अमीर के बीच का फासला इतना असाध्य है कि उसके बारे में सोच कर डर लगता है. एक तरफ लाखों करोड़ के ख़ज़ाने वाले रईस हैं जिन्हें पोस्टर छाप कर बताया जाता है कि भारत अब विकासशील नहीं, विकसित देश है. दूसरी ओर गांवों में खेतों और शहरों में फुटपाथों पर सोने वाले लोग है जिनके लिए पांच रुपए का सिक्का अमावस के चांद की तरह होता है. भारत विकासशील नहीं, विनाशशील देश है और जब तक यह सच हम स्वीकार नहीं करेंगे तब तक हम खुद से और अपनी आत्मा से सरेआम झूठ बोलते रहेंगे..

Monday, April 20, 2009

नव उदारवादी पूंजीवाद-बाज़ारवाद की व्यवस्थागत बीमारी का नतीजा है यह वैश्विक आर्थिक संकट

लगातार गहराते वैश्विक आर्थिक संकट(Global Financial Crisis) के बीच हाल ही में प्रकाशित विश्व बैंक(World Bank) की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ इस साल वैश्विक जी डी पी(Global G.D.P.) की वृद्धि अपनी क्षमता से 5 फीसदी नीचे रह सकती है . अब इस में कोई संदेह नहीं रह गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था गंभीर आर्थिक मंदी के संकट में फंस चुकी है. इस वैश्विक मंदी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ना अब बिलकुल यक़ीनी हो गया है.

तकनीकी और पारिभाषिक तौर पर यह सही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में नहीं है लेकिन यह पूरी बहस इसलिए बेमानी है कि शास्त्रीय तौर पर मंदी की चपेट में न होने के बावजूद अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा काफ़ी हद तक मंदी जैसी स्थिति से गुज़र रहा है. पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से लाखों कर्मचारियों व श्रमिकों को निकाला दिया गया है और अभी भी निकाला जा रहा है. यही नहीं, चाहे वह औद्योगिक उत्पादन खासकर मैन्यूफैक्चरिंग का क्षेत्र हो या निर्यात का, शेयर बाजार हो या नए निवेश का सवाल-हर ओर से लगातार निराशाजनक खबरें आ रही हैं.

योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के अनुसार 2008-09 में हमारी वृध्दि दर 6.5 फीसदी से 6.7 फीसदी के बीच रही. और उनके मुताबिक़ अगले वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान भी वृध्दि दर यही रहेगी और कैलेंडर वर्ष के आधार पर 2009 पिछले साल के मुक़ाबले उल्लेखनीय रूप से बुरा होगा।

वैसे मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में 6 से 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर भी कम नहीं है लेकिन इसे लेकर निश्चिंत होने या अर्थव्यवस्था की बिगड़ती स्थिति पर गुलाबी पर्दा डालने की भी ज़रूरत नहीं है. दरअसल, यह वृद्धि दर भी अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति की सूचक नहीं है. तथ्य यह है कि अर्थव्यवस्था का एक सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र- मैन्यूफैक्चरिंग पिछले अक्तूबर से लगातार बदतर प्रदर्शन कर रहा है. याद रहे कि मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र के प्रदर्शन से लाखों श्रमिकों की रोजी -रोटी जुड़ी हुई है। इसी तरह, निर्माण और रीयल इस्टेट क्षेत्र की स्थिति भी लगातार बिगड़ती जा रही है और इसका असर लाखों मजदूरों की आजीविका पर पड़ रहा है. निर्यात का हाल यह है कि अक्टूबर के बाद से पिछले चार महीनों में निर्यात की वृद्धि दर लगातार नकारात्मक बनी हुई है.

इसके अलावा पिछले कुछ महीनों में विदेशी पूंजी का प्रवाह न सिर्फ कम हुआ है बल्कि काफी बड़े पैमाने पर विदेशी वित्तीय पूंजी देश से बाहर जा रही है. इसी वैश्विक आर्थिक संकट के कारण विकासशील देशों में प्रवासी श्रमिकों द्वारा भेजी जानेवाली आय में भी काफी गिरावट के आसार हैं. इस सबका असर रूपए की कीमत पर पड़ रहा है जो डालर के मुकाबले गिरकर 52 रूपए प्रति डालर के आसपास पहुंच गया है। लेकिन इस सबसे अधिक और बड़ी चिंता की बात यह है कि वैश्विक मंदी और उसके बीच लड़खड़ाती भारतीय अर्थव्यवस्था की असली कीमत लाखों श्रमिकों और कर्मचारियों को अपना रोजगार गंवाकर चुकानी पड़ रही है.

दूसरी तरफ यह भी क़यास किया जा रहा है की मौजूदा वैश्विक मंदी के कारण विकासशील देशों में लगभग 4.6 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे चले जायेंगे. यकीनन, ऐसे लोगों की एक बहुत बड़ी तादाद भारत में भी होगी जो मंदी के कारण रोजगार गंवाकर या मजदूरी में कटौती के कारण एक बार फिर ग़रीबी रेखा के नीचे चली जाएइगी. इसकी वजह यह है कि भारत में ऐसे लोगों की तादाद कुल आबादी में काफ़ी है जो बिल्कुल ग़रीबी रेखा के उपर हैं और किसी भी छोटे-बड़े आर्थिक/वित्तीय झटके से तुरंत ग़रीबी रेखा के नीचे पहुंच जाते हैं. कहने की ज़रूरत नहीं है कि मौजूदा मंदी जैसी स्थिति हाशिए पर पड़े ऐसे लोगों को फिर से गरीबी रेखा के नीचे ढकेल देगी.

वैश्विक पूँजी के बेलगाम तौर-तरीकों के कारण पैदा इस संकट और इन सब सारी बीमारियों की जड़ नव उदारवादी आर्थिक नीति (Neo-Libral Economic Policy) के खिलाफ अब छात्रों, बुद्धजीवियों, किसानों, श्रमिकों और महिलाओं को आवाज़ बुलंद करना होगा..