Friday, October 10, 2008

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी हर मोड़ पे प्रश्नचिन्ह लगाती रही,
राहों में हैं दुश्वारियां पल पल ये बताती रही,
जिस भी राह पर हम चले सुलझाने को ज़िन्दगी,
हर वो राह एक उलझन बढाती गई।

1 comment:

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढिया मुक्तक है\बधाई।