Tuesday, January 13, 2009

वक़्त और जख्म

सुना था की वक्त हर ज़ख्म भर देता है
पर न जाने क्यों मेरे ज़ख्म वक्त के साथ
और गहरे होते जा रहे हैं
भूलने की कोशिश तो बहुत की थी
भूले हुए लोग मेरी तनहाइयों के लुटेरे होते जा रहे हैं
ढूँढने लगा था मैं जिन्दगी की ज़द्दोज़हद में सुकून
पर ख़ुद से बचने के ये रास्ते भी अब अंधेरे होते जा रहे हैं
सोचता था दूरियों से धुंधली पड़ जाएँगी उनकी यादें
पर फासलों से मेरे जेहन में बसे अक्स -ऐ-यार
और सुनहरे होते जा रहे हैं
जला चुका था मै हर सबूत उनकी मोह्हबत के
पर उस आग से रोशन मेरे अंधेरे होते जा रहे हैं
अब मैं साथ नही चाहता हूँ किसी का
तो क्यों मेरे साथी ये सवेरे होते जा रहे हैं

Monday, December 15, 2008

एक आवाज़

available amar:

पंखों को मत खरोचो, पंखो में क्या मिलेगा
उड़ जायेंगे हम यूं ही, गर जज़्बा बुलंद होगा:

गिर भी गए अगर हम, उन बुलंदियों को छूकर;
तुम ही कहोगे देखो, बुलंदियों से गिरा होगा:

हम तो सफ़र करेंगे शोलों में ढल के लेकिन;
हम छू गए जो तुमसे अपनी कहो क्या होगा..........

अमर नाथ ललित

Sunday, November 16, 2008

चाँद पर तिरंगा

सवेरे सवेरे
चाय वाली दुकानपर
किसी ने बताया,
"चाँद पर पहुँचा तिरंगा"
मैंने देखा,
बगल मे खड़ा था एक बालक
भूखा और नंगा
किसी ने बताया,
भारतीय अर्थव्यवस्था ने
मंदी के इस दौर मे भी
apni धाक जमाई
दूर खड़े मजदूर का चेहरा बता रहा था
देश मे कितनी बढ़ गई है महंगाई
अख़बार का कोई पन्ना,
अफगानिस्तान मे बुनियादी संरचना में,
भारत के योगदान को बता रहा था
सामने की मुख्य सड़क पर भरा गन्दा पानी
इस उपलब्धि को मुंह चिढा रहा था
देश मे लगातार अरबपति बढ़ते जा रहे हैं
पर दिनों दिन विदर्भ व बुंदेलखंड में
किसान भूख से मरते जा रहे हैं
हम सूचना प्रौद्योगिकी मे कितना आगे बढ़ गए
पर पदोश मे घटी घटना से अपरिचित रह गए
हम नाभिकीय उर्जा के लिए ज़ोर लगा रहे हैं
पर अपने पन बिजली केन्द्रों को ही सही नही कर पा रहे हैं ........
.....................????????????????????????

Saturday, November 15, 2008

अजनबी रिश्ते

काश
हम फ़िर से बन जाते अजनबी
वो अजनबी
जो अनजान थे एक दूजे से
जान पहचान के बाद भी।
वो अजनबी जो भटका करते थे घंटों
एक दूजे से मिलने को ,जानने को।
कितना अनूठा था,
वो अजनबी रिश्ता
जब हम जानते थे बस दूसरे के सदगुणोंको ,
वो रिश्ता ,
जिसमे हम एक दूजे की खूबियों को
अतुलनीय समझा करते थे
कितने हसीं थे वो अजनबी लम्हें
जब हम घंटों बिता देते थे,एक दूजे को सुनने में
जब दिन निकल जाते थे,एक दूजे की हौंसला अफजाई मे

फ़िर
बढीं नजदीकियां हमारे बीच
एक दूजे को खूब जांचा परखा हमने
और फ़िर इस जांच परख मे ही रिश्तों मे प्रगाढ़ता बढ़ी
और फ़िर उफ़
क्या हुआ ऐसा कि
हम सिर्फ़ एक दूजे को परखने मे लग गए
एक दूजे को इतना पहचान लिया हमने
कि
खूबियों से अधिक कमियां दिखने लगीं दूजे कि
हम जुट गए गलतियाँ खोजने मे,दूसरे की
ताकि
कोस सकें एक दूजे को हम
और
वक्त गुजार सकें
और अब जब की हम दोनो को ही
अहसास है इन बेहद नजदीकी दूरियों का
तलाशना है हमें फ़िर से एक अटूट रिश्ता
लगता है अब हमें
कितने अच्छे थे वो अजनबी रिश्ते
काश
हम बना पायें अपने बीच
फ़िर वही अजनबी रिश्ते
ला पते फ़िर वो लम्हें,
खोज पातेफ़िर वही कौतूहल
फ़िर वही तत्परता , वही उमंग
बन पते फ़िर वही अजनबी।

उनकी नफरत

जरूरत नहीं मुझे किसी के साथ की
हसरत हूँ मैं ख़ुद सारी कायनात की
दूर जाकर मुझसे वो समझते हैं कि
मिट गया हूँ मैं
गर महसूस कर के देखेंगे तो जान जायेंगे कि
आज भी उनकी साँसों के सिवा कहीं नहीं गया हूँ मैं
आज भी वो आईने पे
अपनी साँसों की स्याही से
नाम मेरा लिखते हैं
कहते नहीं हैं मुझसे पर
शाम के सूरज के हाथों मुझे अपनी
आंखों का हाल लिखते हैं
हर आते जाते मुसाफिर में
चेहरा मेरा ढूंढते हैं
ठान रखी है मुझसे फ़िर न मिलने कि
पर वो ठिकाने मुझसे मिलने के हर जगह ढूंढते है
जाने कब ये मानेंगे कि
वो आज भी मुझमे अपने
आने वाले कल को ढूंढते हैं

Sunday, October 19, 2008

वक्त और दोस्त

वक्त ने हमको आस्तीन के सांप दिखाए हैं,
दूसरों पे भरोसे मे हमने अपने हाथ जलाये हैं,
हम बैठ कर इंतज़ार करते रहे दुश्मनों का,
पर अब मेरी हस्ती मिटाने दोस्त ही आए हैं।

खतरनाक मानसिकता

इंडिया टूडे का १५ अक्टूबर का अंक पढ़ा। इसमे दिल्ली में विस्फोट के आरोपी तीनो अभियुक्तों जिया-उर-रहमान,शकील,साकिबनिसार की बात पढ़ी। उस बातचीत को पढने के बाद मैं सिहरउठा। इस बातचीत मेंजो एक बात साफ़ नज़र आती है वह ये किइन तीनो ने धमाकों में अपना हाथ मान लिया है। और यह भी कि उन्हें इसका कोई पछतावा भी नहीं है।
अब सवाल यह है कि अगर ये तीनो अपना जुर्म मान रहे हैं और उस पर किसी भी तरह की शर्मिंदगी नहीं महसूस कर रहे हैं तो फ़िर इनके पैरोकार राजनेता बिनाह पर यह महसूस कर रहे हैं की देस में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर उन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है। इन लोगों ने मुठभेड़ में मारे गए आतिफ के इन विस्फोटों में शामिल होने की बात भी मानी है। इस मुठभेड़ को फर्जी मानने वाले मानवाधिकारीयों व राजनेताओ से मैं अपील करूंगा की मात्र एक समुदाय के होने के कारणअगर इन लोगों को दोषी नही माना जा सकता तो सिर्फ़ उस समुदाय विशेष के होने से ये निर्दोष भी नहीं हो जाते।राजनेताओं को अपनी वोट की राजनीति से उठ कर देश के बारे में भी सोचना चाहिए।मानवाधिकार संगठनों को धमाकों में मारे गए लोगों जिसमे शायद मुस्लिम भी थे और आम जन का जो इन घटनाओं से दहल गए है का भी ख़याल करना चाहिए।
ज़रा रहमान के उन शब्दों पर गौर करें जिसमे उसने माना है की वह उस बाज़ार में भी dhamaake कर सकता है jahan उसकी माँ के होने की sambhavna है। इससे उसके dimaag मे बसे खतरनाक मनसूबे पता चलते हैं। इस से पता चलता है की ऐसे लोग किसी भी मज़हब के हों दुश्मन ये इंसानियत के हैं। उस इंसानियत के जिसकी बेहतरी के लिए मानवाधिकारी मरे जा रहे हैं।ऐसे लोगों की वकालत करके हम मात्र इंसानियत का नुकसान करते हैं। इस तरह के लोगों की सिर्फ़ निंदा की जा सकती है और कुछ नहीं।
फ़िर भी अगर आपको कुछ ग़लत लगता है तो इंतज़ार करिए मानवाधिकारी जाँच कर रहे हैं इतना हो हल्ला मचाने से सिर्फ़ और सिर्फ़ समाज मे विघटन पैदा होता है और कुछ नहीं। आम जनता को इस तरह के वक्तव्यों जिनमे मज़हबी आधार पर अपील की जाए से बचने की ज़रूरत है।
वरना याद रखिये अगर इस मानसिकता के लोग खुले घुमते रहे तो अगला धमाका आपके पास भी हो सकता है। उन धमाकों मे किसी भी मज़हब का कोई भी हो सकता है, हाँ भाई नेता जी भी और मानवाधिकारी भी या फ़िर उनका कोई सगा सम्बन्धी।

तो आइये हम सब आतंक का विरोध करें एक साथ,
हिंदू हो या हो मुस्लिम उठे अब सबका हाथ,
पस्त कर दो अब ऐसे मंसूबों को,
जो अंजाम देते हैं ऐसे विस्फोटों को।


Friday, October 10, 2008

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी हर मोड़ पे प्रश्नचिन्ह लगाती रही,
राहों में हैं दुश्वारियां पल पल ये बताती रही,
जिस भी राह पर हम चले सुलझाने को ज़िन्दगी,
हर वो राह एक उलझन बढाती गई।