Thursday, July 24, 2008

मिलना मत कभी अपने आप से;
घबरा जाओगे
ढूँढने पर भी ख़ुद को
अपने आप में नहीं पाओगे
चेहरा जो तुम दुनिया को दिखाते हो
एक छलावा है
सबको तो तुम बरगला सकते हो
पर कभी ये सोचा है कि
ख़ुद से कैसे झूठ बोल पाओगे
झाँकना मत कभी तुम अपने गिरेबां में
वरना अपने आप से खुद शर्मा जाओगे
जो कहते रहे हो तुम सबसे आज तक
वही बातें ख़ुद से कहोगे तो
अपनी असलियत से वाकिफ हो जाओगे
जब कभी फ़िर मेरे बारे में सोचोगे
तो मैं तुम्हारी हर बात में -
तुम्हारे हर ख़यालात में
आज भी रहता हूँ जान जाओगे

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